ईरान पर हमला : ईरान-इजरायल संघर्ष इन दिनों चरम पर है। अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई। इस घटना ने मिडिल ईस्ट को हिला दिया है। लेकिन भारत ने इस पर कोई सख्त बयान नहीं दिया। न तो हमले की निंदा की, न ही ईरान का पक्ष लिया। पीएम नरेंद्र मोदी ने इजरायल के पीएम नेतन्याहू और UAE के नेताओं से बात की, लेकिन ईरान को लेकर चुप्पी साधी। यह चुप्पी क्यों है? विशेषज्ञों के मुताबिक, यह भारत की रणनीतिक चुप्पी है जो राष्ट्रीय हितों की रक्षा करती है।
भारत की चुप्पी के पीछे मुख्य रणनीतिक कारण
खाड़ी देशों से गहरे संबंध: भारत के लाखों नागरिक UAE, सऊदी अरब जैसे खाड़ी देशों में रहते और काम करते हैं। इनमें से ज्यादातर भारतीय मूल के हैं। युद्ध बढ़ने पर उनकी सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता है। ईरान से संबंध अच्छे हैं, लेकिन खाड़ी देशों से तेल, व्यापार और प्रवासी भारतीयों के हित ज्यादा मजबूत हैं। चुप्पी से भारत इन देशों से दूरी नहीं बनाता।

तेल और एनर्जी सुरक्षा: भारत अपनी ज्यादातर तेल जरूरतें खाड़ी देशों से पूरी करता है। ईरान से तेल आयात कम है। अगर भारत ईरान का पक्ष लेता, तो खाड़ी देश नाराज हो सकते थे, जिससे तेल की कीमतें बढ़तीं और अर्थव्यवस्था प्रभावित होती। चुप्पी से भारत तेल आपूर्ति सुरक्षित रखता है।
इजरायल के साथ मजबूत साझेदारी: पिछले कुछ सालों में भारत-इजरायल संबंध ‘स्पेशल स्ट्रेटजिक पार्टनरशिप’ तक पहुंच गए हैं। रक्षा, टेक्नोलॉजी और खुफिया जानकारी में सहयोग बढ़ा है। अमेरिका की करीबी के कारण भी भारत इजरायल का पक्ष लेने की स्थिति में है। खामेनेई ने भारत के आंतरिक मामलों (जैसे CAA, किसान आंदोलन) पर कई बार टिप्पणी की थी, जिससे भारत में नकारात्मक भावना थी।
- ईरान से संबंध सीमित: ईरान के साथ चाबहार पोर्ट जैसा प्रोजेक्ट है
- लेकिन संबंध रूस या अमेरिका जितने गहरे नहीं। खामेनेई की मौत पर भारत ने सिर्फ संवाद की
- बात कही, पक्ष नहीं लिया। विशेषज्ञ संदीप कुमार सिंह (JNU) कहते हैं, “खामेनेई ने भारत के
- आंतरिक मामलों में बार-बार दखल दिया। ईरान का पक्ष लेना राष्ट्रीय हितों के खिलाफ होता।”
अमेरिका और रूस-चीन का संतुलन: भारत अमेरिका के साथ करीब आ रहा है, लेकिन रूस-चीन से भी संबंध बनाए रखता है। ईरान रूस-चीन का सहयोगी है, लेकिन भारत की चुप्पी से कोई बड़ा नुकसान नहीं। भारत गुटबाजी से दूर रहकर संतुलन बनाता है।
भारत की नीति का फायदा क्या?
- क्षेत्रीय स्थिरता: भारत चाहता है कि युद्ध जल्दी खत्म हो। चुप्पी से वह किसी को उकसाता नहीं।
- प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा: MEA ने एडवाइजरी जारी की, फ्लाइट्स प्रभावित हुईं, लेकिन चुप्पी से स्थिति बिगड़ने से बचा।
- आर्थिक हित: तेल कीमतें स्थिर रखना, व्यापार जारी रखना।
- वैश्विक छवि: भारत ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की नीति पर चलता है, लेकिन राष्ट्रीय हित पहले।
- विपक्ष ने मोदी सरकार की चुप्पी की आलोचना की, इसे ‘कमजोरी’ बताया।
- कांग्रेस ने कहा कि यह ‘मॉरल लीडरशिप’ की कमी है। लेकिन एक्सपर्ट्स मानते हैं
- कि यह स्ट्रेटजिक ऑटोनॉमी है, न कि निर्भरता। भारत ने SCO में भी इजरायल की निंदा से दूरी बनाई।
ईरान पर हमला और खामेनेई की मौत एक बड़ा भू-राजनीतिक बदलाव है। भारत की चुप्पी दिखाती है कि वह अब ‘सभी के साथ, किसी के साथ नहीं’ की नीति पर चल रहा है। हितों की रक्षा के लिए यह जरूरी है। क्षेत्र में स्थिरता आए, यही भारत की प्राथमिकता है।
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