NPPA अपडेट : आम आदमी की जेब पर एक और बोझ! 1 अप्रैल 2026 से पेनकिलर, एंटीबायोटिक्स, बुखार की दवाएं और कई अन्य जरूरी दवाएं महंगी हो जाएंगी। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) ने नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन्स (NLEM) में शामिल 1000 से अधिक दवाओं की कीमतों में औसतन 0.65% की बढ़ोतरी की अनुमति दे दी है।
यह बढ़ोतरी थोक मूल्य सूचकांक (WPI) के आधार पर की गई है, जिसमें 2025 की तुलना में 2024 की समान अवधि में 0.64956% का वार्षिक बदलाव दर्ज किया गया। सरकारी नियम के अनुसार, नियंत्रित दवाओं की कीमतों में साल में सिर्फ एक बार ही समायोजन की अनुमति होती है।

NPPA अपडेट कौन-कौन सी दवाएं प्रभावित होंगी?
इस मूल्य वृद्धि से सबसे ज्यादा असर उन दवाओं पर पड़ेगा जो रोजमर्रा की बीमारियों में इस्तेमाल होती हैं। इनमें शामिल हैं:
- पैरासिटामोल (दर्द और बुखार की सबसे आम दवा)
- एंटीबायोटिक्स जैसे एजिथ्रोमाइसिन (बैक्टीरियल संक्रमण के इलाज के लिए)
- सिप्रोफ्लोक्सासिन (30% तक कीमत बढ़ने की संभावना बताई जा रही है)
- एनीमिया की दवाएं
- विटामिन और मिनरल सप्लीमेंट्स
- स्टेरॉयड
- कोविड-19 से संबंधित कुछ दवाएं (मध्यम और गंभीर मामलों के लिए)
ये सभी दवाएं NLEM की सूची में शामिल हैं, जिसका मकसद आम लोगों को सस्ती और जरूरी दवाएं उपलब्ध कराना है। लेकिन कच्चे माल की बढ़ती लागत के कारण अब इनकी कीमतें भी थोड़ी बढ़ रही हैं।
क्यों बढ़ रहे हैं दवाओं के दाम?
NPPA ने यह फैसला पूरी तरह WPI डेटा के आधार पर लिया है। लेकिन फार्मा उद्योग के अधिकारियों का कहना है कि सिर्फ 0.65% की बढ़ोतरी काफी नहीं है। ईरान युद्ध और वैश्विक सप्लाई चेन की समस्याओं के कारण कच्चे माल (Active Pharmaceutical Ingredients – APIs) की कीमतों में भारी उछाल आया है।
उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार:
- APIs की औसत कीमत में 30-35% की बढ़ोतरी हुई है।
- ग्लिसरीन की कीमत में 64% उछाल।
- पैकेजिंग सामग्री (पॉलीविनाइल क्लोराइड और एल्युमीनियम फॉयल) में 40% तक बढ़ोतरी।
- पैरासिटामोल जैसे महत्वपूर्ण API की लागत भी काफी बढ़ गई है।
फार्मा लॉबी के एक प्रतिनिधि ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “सॉल्वेंट्स जैसे ग्लिसरीन और प्रोपलीन ग्लाइकॉल, और लिक्विड दवाओं (सिरप, ड्रॉप्स) में इस्तेमाल होने वाले इंटरमीडिएट्स महंगे हो गए हैं। इससे मुनाफे का मार्जिन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। हम NPPA के सामने बेहतर बढ़ोतरी की मांग रखेंगे।”
आम लोगों पर क्या पड़ेगा असर?
- हालांकि सरकारी बढ़ोतरी सिर्फ 0.65% के आसपास है, लेकिन कई दवाओं की असल
- उत्पादन लागत ज्यादा बढ़ने से कंपनियां मार्जिन बचाने के लिए कीमतें समायोजित कर सकती हैं।
- इससे मिडिल क्लास और कम आय वाले परिवारों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा
- खासकर उन घरों में जहां बुखार, दर्द, संक्रमण या एनीमिया जैसी सामान्य बीमारियां अक्सर होती हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि जरूरी दवाओं की कीमत बढ़ने से लोग सस्ते विकल्प या जेनेरिक दवाओं की ओर रुख कर सकते हैं, लेकिन क्वालिटी से समझौता नहीं करना चाहिए।
क्या कहती है सरकार?
NPPA ने स्पष्ट किया कि यह बढ़ोतरी वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के आर्थिक सलाहकार कार्यालय द्वारा दिए गए WPI आंकड़ों पर आधारित है। नियंत्रित दवाओं की कीमतें हर साल इसी आधार पर समायोजित की जाती हैं ताकि फार्मा कंपनियां उत्पादन जारी रख सकें और दवाओं की उपलब्धता बनी रहे।
उपभोक्ताओं के लिए सलाह
- 1 अप्रैल से पहले अपनी जरूरी दवाओं का स्टॉक बना लें (डॉक्टर की सलाह से)।
- जेनेरिक नाम से दवाएं खरीदें, ब्रांडेड की बजाय।
- कीमतों की जांच करें – हर दवा पर MRP छपा होता है।
- अगर दाम ज्यादा लगे तो स्थानीय फार्मेसी या NPPA की वेबसाइट पर शिकायत दर्ज कराएं।
1 अप्रैल 2026 से शुरू होने वाली यह छोटी-सी बढ़ोतरी बड़े पैमाने पर आम लोगों की स्वास्थ्य देखभाल की लागत को प्रभावित करेगी। फार्मा उद्योग कच्चे माल की महंगाई से जूझ रहा है, वहीं आम आदमी महंगाई के इस नए दौर से परेशान है। सरकार को चाहिए कि वह दवाओं की उपलब्धता और किफायती दाम दोनों को सुनिश्चित करे।
स्वास्थ्य सबसे बड़ी संपत्ति है। सही जानकारी और सतर्कता से हम इस स्थिति का बेहतर सामना कर सकते हैं। अगर आप या आपके परिवार में कोई पुरानी बीमारी है, तो डॉक्टर से सलाह लेकर दवाओं का प्लान पहले से बना लें।
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