पुजारियों के वेतन देश के सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में पुजारियों और मंदिर कर्मचारियों के वेतन को लेकर दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करने से इनकार कर दिया। इस मामले में अदालत ने भाजपा नेता और वकील Ashwini Kumar Upadhyay को फटकार लगाते हुए कहा, “मंदिरों के पुजारियों के चक्कर में मत पड़िए, आपको पता है पुजारी कितना पैसा कमाते हैं?” सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी अब राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गई है।
यह मामला उन पुजारियों और मंदिर कर्मचारियों के वेतन, सेवा शर्तों और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा था, जो देशभर के सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में कार्यरत हैं। याचिका में मांग की गई थी कि केंद्र और राज्य सरकारें एक न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति बनाएं, जो मंदिर कर्मचारियों के वेतन और अन्य सुविधाओं की समीक्षा करे।

पुजारियों के वेतन क्या थी याचिका की मुख्य मांग?
भाजपा नेता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दायर इस PIL में कहा गया था कि सरकारी नियंत्रण वाले कई मंदिरों में पुजारियों और कर्मचारियों को न्यूनतम मजदूरी तक नहीं मिल रही है। याचिका में यह भी मांग की गई कि पुजारियों, सेवादारों और मंदिर कर्मचारियों को “कर्मचारी” का दर्जा दिया जाए ताकि उन्हें Code on Wages 2019 के तहत लाभ मिल सके।
- याचिका में दावा किया गया कि कई राज्यों में मंदिर प्रशासन पूरी तरह सरकार के अधीन है
- लेकिन वहां कार्यरत कर्मचारियों को नियमित वेतन, पेंशन और स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिलतीं।
- कई पुजारी केवल दक्षिणा और मानदेय पर निर्भर हैं, जिससे उनका जीवन प्रभावित हो रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
- जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से
- साफ इनकार कर दिया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि वह संविधान के अनुच्छेद 32 के
- तहत इस याचिका पर विचार नहीं कर सकता। अदालत ने यह भी कहा
- कि प्रभावित व्यक्ति सीधे संबंधित प्राधिकरण या अदालत का रुख कर सकते हैं।
- सुनवाई के दौरान कोर्ट की टिप्पणी सबसे ज्यादा चर्चा में रही। अदालत ने कहा:
“मंदिरों के पुजारियों के चक्कर में मत पड़िए।”
कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या याचिकाकर्ता जानते हैं कि कई पुजारी अच्छी कमाई भी करते हैं। इसके बाद अदालत ने साफ कर दिया कि वह इस मामले में कोई आदेश पारित नहीं करेगी।
क्यों उठाया गया यह मुद्दा?
- याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि उन्हें यह मामला तब पता चला जब वे वाराणसी
- स्थित Kashi Vishwanath Temple गए थे। वहां उन्होंने महसूस किया कि कई
- पुजारियों और कर्मचारियों को सम्मानजनक जीवन के लिए पर्याप्त वेतन नहीं मिल रहा।
- इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में PIL दायर की।
याचिका में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में मंदिर कर्मचारियों द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शनों का भी जिक्र किया गया। दावा किया गया कि कई जगह पुजारियों को अकुशल मजदूरों से भी कम भुगतान किया जा रहा है।
मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण का मुद्दा
- इस याचिका में एक और बड़ा मुद्दा उठाया गया था। याचिकाकर्ता ने कहा
- कि कई मंदिर राज्य सरकारों के नियंत्रण में हैं, जबकि मस्जिदों और चर्चों पर ऐसा नियंत्रण नहीं है।
- इसलिए सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि मंदिर कर्मचारियों को उचित वेतन और सुविधाएं दे।
- हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क पर विस्तार से कोई टिप्पणी नहीं की और मामले में हस्तक्षेप से बचा।
क्या आगे बढ़ेगा मामला?
- सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनवाई से इनकार किए जाने के बाद अश्विनी उपाध्याय ने याचिका वापस लेने की
- अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। साथ ही कोर्ट ने उन्हें संबंधित
- अधिकारियों के सामने मामला उठाने की छूट भी दी।
अब माना जा रहा है कि यह मुद्दा भविष्य में फिर किसी अन्य कानूनी या प्रशासनिक मंच पर उठ सकता है। मंदिर कर्मचारियों के वेतन और सामाजिक सुरक्षा को लेकर बहस पहले भी होती रही है और आने वाले समय में यह राजनीतिक मुद्दा भी बन सकता है।
सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में पुजारियों और कर्मचारियों के वेतन को लेकर दायर PIL पर सुप्रीम कोर्ट का रुख काफी सख्त नजर आया। अदालत ने साफ कर दिया कि वह इस मामले में सीधे दखल नहीं देगी। हालांकि इस बहस ने मंदिर कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति, सरकारी नियंत्रण और धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन जैसे मुद्दों को फिर चर्चा में ला दिया है। आने वाले समय में यह विषय राजनीति और न्यायपालिका दोनों में महत्वपूर्ण बना रह सकता है।