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चाबहार पोर्ट में भारत की भागीदारी कम क्यों हो रही है? अमेरिकी प्रतिबंधों का दबाव और भविष्य की चुनौतियां!

On: January 17, 2026 4:39 AM
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चाबहार पोर्ट में भारत : ईरान के चाबहार पोर्ट में भारत की लगभग एक दशक पुरानी भागीदारी अब पुनर्विचार के दौर में है। अमेरिका के बढ़ते प्रतिबंधों और सशर्त छूट की समय-सीमा (26 अप्रैल 2026 तक) के कारण भारत अपनी सीधी भागीदारी को कम करने की तैयारी में है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत लगभग 120 मिलियन डॉलर (करीब 1000 करोड़ रुपये) ट्रांसफर करके डायरेक्ट इन्वॉल्वमेंट खत्म कर सकता है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि यह कोई अचानक फैसला नहीं, बल्कि अमेरिका के साथ चल रही बातचीत का हिस्सा है। आइए जानते हैं पूरी वजह, विकास और प्रभाव।

चाबहार पोर्ट का महत्व: भारत के लिए रणनीतिक गेटवे

#चाबहार पोर्ट ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर ओमान की खाड़ी में स्थित है। यह भारत के लिए अफगानिस्तान, सेंट्रल एशिया और यूरोप तक पहुंच का वैकल्पिक रास्ता है, जो पाकिस्तान को बायपास करता है।

भारत ने 2016 से पोर्ट के विकास में बड़ा निवेश किया है। 2024 में 10 साल का समझौता हुआ, जिसमें शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल का ऑपरेशन भारत को मिला। यहां भारत ने रेल लाइन (ज़ाहेदान तक) और टर्मिनल डेवलपमेंट पर काम किया।

चाबहार पोर्ट में भारत
चाबहार पोर्ट में भारत

अमेरिकी प्रतिबंधों का दबाव: मुख्य कारण क्या है?

  • अमेरिका ईरान पर लगातार सख्त प्रतिबंध लगा रहा है। सितंबर 2025 में ट्रंप प्रशासन ने 2018 की
  • छूट रद्द की, जो चाबहार को प्रतिबंधों से बचाती थी। बाद में 6 महीने की सशर्त छूट दी गई
  • जो 28 अक्टूबर 2025 के लेटर से लागू है और 26 अप्रैल 2026 तक वैध है।

ट्रंप ने हाल ही में कहा कि ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगेगा। इससे भारत की अमेरिका के साथ मजबूत व्यापारिक साझेदारी पर खतरा है।

  • विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा: “28 अक्टूबर 2025 को अमेरिकी ट्रेजरी विभाग
  • ने सशर्त प्रतिबंध छूट पर गाइडेंस जारी किया, जो 26 अप्रैल 2026 तक वैध है।
  • हम अमेरिकी पक्ष के साथ इस व्यवस्था को अंतिम रूप देने में लगे हैं।”

भारत की नई रणनीति: सीधी भागीदारी कम, अप्रत्यक्ष समर्थन जारी

  • IPGL (इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड) के बोर्ड से सरकारी अधिकारी इस्तीफा दे चुके हैं।
  • कंपनी की वेबसाइट बंद कर दी गई ताकि प्रतिबंधों से बचा जा सके।
  • भारत एक नई एंटिटी बनाने पर विचार कर रहा है, जो पोर्ट के विकास को आगे बढ़ाएगी
  • बिना सरकारी डायरेक्ट एक्सपोजर के।
  • यह “मैनेज्ड और लिमिटेड पार्टिसिपेशन” कहा जा रहा है, न कि पूरा

राजनीतिक विवाद और विपक्ष की प्रतिक्रिया

  • कांग्रेस ने सरकार पर आरोप लगाया कि अमेरिकी दबाव में चाबहार से पीछे हट रही है।
  • पवन खेड़ा ने कहा कि यह रणनीतिक हार है। सरकार ने इसे खारिज करते हुए
  • कहा कि क्षेत्रीय हितों की रक्षा के साथ अमेरिका से संतुलन बनाया जा रहा है।

भविष्य की चुनौतियां और संभावनाएं

चाबहार भारत की कनेक्टिविटी और इंडो-पैसिफिक रणनीति का अहम हिस्सा है। अप्रैल 2026 तक छूट बढ़ाने की कोशिश जारी है। यदि नहीं बढ़ी, तो भारत को अप्रत्यक्ष रास्ते तलाशने पड़ेंगे। यह घटना दिखाती है कि वैश्विक भू-राजनीति में अमेरिका-ईरान तनाव भारत जैसे देशों को कठिन विकल्प चुनने पर मजबूर करता है।

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