तमिलनाडु राजनीति : तमिलनाडु की राजनीति में 27 फरवरी 2026 को एक बड़ा मोड़ आया जब पूर्व मुख्यमंत्री और एआईएडीएमके के दिग्गज नेता ओ पन्नीरसेल्वम (ओपीएस) ने डीएमके में शामिल होने का ऐलान किया। चेन्नई के डीएमके मुख्यालय अन्ना अरिवालयम में सीएम एमके स्टालिन की मौजूदगी में यह समारोह हुआ। ओपीएस के साथ उनके बेटे पी रविंद्रनाथ कुमार और कई समर्थक भी डीएमके में शामिल हो गए। यह घटना सिर्फ एक नेता का पार्टी बदलना नहीं, बल्कि तमिलनाडु की राजनीतिक समीकरणों को बदलने वाली है। ओपीएस, जो तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं, जयललिता के करीबी थे, लेकिन अब स्टालिन के साथ खड़े हैं।
ओपीएस का राजनीतिक सफर रोचक रहा है। 2016 में जयललिता के निधन के बाद वे वीके शशिकला के भरोसेमंद थे, लेकिन जब शशिकला ने कथित रूप से उन्हें साजिश में फंसाया, तो ओपीएस ने विद्रोह कर दिया। इससे एआईएडीएमके में विभाजन हुआ और ओपीएस को 2022 में पार्टी से निकाल दिया गया। 2024 के चुनावों में ओपीएस की पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली, जिसके बाद उनके पास विकल्प सीमित थे – या तो अभिनेता विजय की नई पार्टी में जाना या मजबूत डीएमके से जुड़ना। आखिरकार, उन्होंने डीएमके का दामन थामा।

स्टालिन का ओपीएस को शामिल करने का कारण: दक्षिणी जिलों में मजबूती
एमके स्टालिन ने ओपीएस को डीएमके में क्यों शामिल किया? इसके पीछे रणनीतिक सोच है। ओपीएस मुकुलाथोर (थेवर) समुदाय से हैं, जो दक्षिणी तमिलनाडु में मजबूत प्रभाव रखता है। डीएमके को इन इलाकों में चुनौतियां मिलती रही हैं, और ओपीएस का शामिल होना यहां की कमजोरी को भर सकता है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि स्टालिन ने ओपीएस को विधानसभा स्पीकर का पद ऑफर किया है, अगर डीएमके सत्ता में वापस आती है। यह पद संवैधानिक महत्व का है, जो ओपीएस को सम्मानजनक स्थिति देगा और डीएमके को दक्षिणी क्षेत्रों में एक मजबूत चेहरा मिलेगा।
- ओपीएस के समर्थकों में वी वैथिलिंगम और पीएच मनोज पांडियन जैसे नेता पहले ही डीएमके में शामिल हो चुके थे।
- हाल ही में ओपीएस और मंत्री पीके सेकरबाबू की मुलाकात ने अटकलों को हवा दी थी।
- ओपीएस के समर्थक पी अय्यप्पन ने कहा कि डीएमके की सत्ता में वापसी तय है।
- स्टालिन का यह कदम कांग्रेस को भी संदेश है, जो डीएमके गठबंधन में ज्यादा सीटें और पावर शेयरिंग
- की मांग कर रही है। ओपीएस के जरिए स्टालिन ने दिखाया कि डीएमके दक्षिणी इलाकों में खुद मजबूत है।
तमिलनाडु राजनीति की इनसाइड स्टोरी: विभाजन और रणनीति
तमिलनाडु की राजनीति में ओपीएस का शामिल होना एक बड़ी घटना है। जयललिता के बाद एआईएडीएमके में ईपीएस (एडप्पाडी के पलानीस्वामी) ने अपनी पकड़ मजबूत की, जिससे ओपीएस हाशिए पर चले गए। 75 साल की उम्र में ओपीएस ने राजनीतिक अस्तित्व बचाने के लिए यह कदम उठाया। डीएमके के लिए यह प्रतीकात्मक जीत है – एक पूर्व एआईएडीएमके सीएम का उनकी पार्टी में आना सत्ता की ताकत दिखाता है।
हालांकि, डीएमके कार्यकर्ताओं में असंतोष हो सकता है, क्योंकि वे पहले ओपीएस के खिलाफ चुनाव लड़ चुके हैं। लेकिन नेतृत्व का फोकस जीत पर है, और चुनाव बाद समायोजन होगा। ओपीएस का शामिल होना डीएमके को विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में मजबूती देगा, खासकर दक्षिणी जिलों में। यह फैसला व्यावहारिक राजनीति का उदाहरण है या सिद्धांतों से समझौता? मतदाताओं में यह सवाल उठ रहा है।
डीएमके, एआईएडीएमके और बीजेपी पर असर
- डीएमके के लिए यह मजबूती है – समुदाय आधारित प्रभाव बढ़ेगा, चुनावी रणनीति मजबूत होगी
- और गठबंधन में दबदबा बनेगा। एआईएडीएमके के लिए झटका, क्योंकि पूर्व सीएम का जाना पार्टी
- की कमजोरी उजागर करता है। बीजेपी पर सीधा असर नहीं, लेकिन तमिलनाडु में गठबंधन
- की संभावनाएं प्रभावित हो सकती हैं। कुल मिलाकर, यह घटना 2026 चुनावों से
- पहले तमिलनाडु राजनीति को नई दिशा दे रही है। अगर आप राजनीति के शौकीन हैं!
Read More : Refurbished Gaming Laptops कम बजट में पावरफुल गेमिंग का स्मार्ट विकल्प!