पश्चिम बंगाल वोटर लिस्ट : पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया में अब तक 60,06,675 मतदाताओं (कुल मतदाताओं का लगभग 8.5%) के नामों पर गंभीर असमंजस है। अंतिम मतदाता सूची 28 फरवरी 2026 को प्रकाशित हो रही है, लेकिन इन नामों की पात्रता अब EROs (Electoral Registration Officers) के बजाय सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त 530 न्यायिक अधिकारियों (पश्चिम बंगाल, ओडिशा और झारखंड से) द्वारा समीक्षा की जा रही है। यदि ये अधिकारी नामों को मंजूरी नहीं देते, तो संबंधित मतदाता आगामी विधानसभा चुनाव में वोट नहीं डाल पाएंगे और अंतिम सूची में उनके नाम ‘निर्णय के अधीन’ दर्ज होंगे।
माइक्रो-ऑब्जर्वर्स की भूमिका और अनियमितताएं!
ERO और AERO ने दस्तावेज जांचकर लाखों नाम मंजूर किए थे, लेकिन चुनाव आयोग के माइक्रो-ऑब्जर्वर्स (राज्य में 8,100 नियुक्त) ने विसंगतियां पकड़ीं। इनमें AI-जनरेटेड वोटर आईडी, अवैध दस्तावेज और पुरुषों के लिए ICDS प्रमाण पत्र का गलत उपयोग शामिल है। 11 फरवरी के बाद माइक्रो-ऑब्जर्वर्स ने पहले मंजूर मामलों को भी रिवर्स करना शुरू किया, जिसमें एक सेवारत वरिष्ठ IAS अधिकारी का नाम भी आया। सुनवाई की अंतिम तिथि 14 फरवरी तक लंबित मामलों की संख्या कुछ लाख से बढ़कर 60 लाख के पार पहुंच गई।

मुस्लिम बहुल जिलों में सबसे ज्यादा प्रभाव
आंकड़ों के अनुसार, नाम कटने या समीक्षा के सबसे ज्यादा मामले मुस्लिम बहुल जिलों में हैं:
- मुर्शिदाबाद: 11 लाख मामले
- मालदा: 8.28 लाख मामले
- दक्षिण 24 परगना: 5.22 लाख
- उत्तर 24 परगना: 5 लाख
- अन्य जैसे झारग्राम और कालिम्पों में भी हजारों मामले लंबित
ये जिले TMC के मजबूत गढ़ माने जाते हैं, जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में नामों पर सवाल चुनाव की निष्पक्षता को प्रभावित कर सकता है।
पार्टियों की तीखी प्रतिक्रियाएं!
तृणमूल कांग्रेस (TMC) और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि माइक्रो-ऑब्जर्वर्स ने EROs के अधिकारों का अतिक्रमण किया है। ममता ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि यह प्रक्रिया राज्य को निशाना बना रही है और लाखों वैध मतदाताओं के अधिकार छीने जा रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि 1.2 करोड़ तक नाम कट सकते हैं।
- दूसरी ओर, चुनाव आयोग के अधिकारियों ने दस्तावेजों में भारी अनियमितताओं का हवाला दिया।
- पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज कुमार अग्रवाल ने स्थिति को अनिश्चित बताया
- और कहा कि सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से यह अनूठी स्थिति बनी है।
पहले चरण में 58 लाख नाम पहले ही हटाए गए!
SIR के पहले चरण में 16 दिसंबर 2025 को जारी ड्राफ्ट लिस्ट में मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.08 करोड़ रह गई थी। 58 लाख से ज्यादा नाम मौत, प्रवासन, दोहराव और सत्यापन न होने के कारण हटाए गए। अब दूसरे चरण में अतिरिक्त लाखों नामों पर खतरा मंडरा रहा है।
2026 विधानसभा चुनाव पर असर की आशंका
- पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले यह संकट TMC और BJP के बीच टकराव को
- और तेज कर रहा है। मुस्लिम मतदाता (राज्य की आबादी का 27-30%) TMC का मजबूत आधार हैं
- खासकर मुर्शिदाबाद, मालदा और 24 परगना जैसे जिलों में। यदि इन इलाकों में बड़े पैमाने पर नाम कटते हैं
- तो TMC की सीटें प्रभावित हो सकती हैं। BJP इसे ‘अवैध घुसपैठियों’ को हटाने की प्रक्रिया बता रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि SIR प्रक्रिया लोकतंत्र की निष्पक्षता के लिए जरूरी है, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर और चुनाव से ठीक पहले होने से विवाद बढ़ रहा है। अंतिम सूची 28 फरवरी को आएगी, जिसके बाद ही साफ तस्वीर उभरेगी।
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