भोजशाला का इतिहास : मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला एक ऐसा ऐतिहासिक स्थल है, जो 1000 साल से अधिक पुराना है। यहां हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा है। हिंदू इसे राजा भोज द्वारा स्थापित वाग्देवी (सरस्वती देवी) का मंदिर मानते हैं, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद कहते हैं। हाल ही में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट ने इस विवाद को नया मोड़ दे दिया है। यह ब्लॉग पोस्ट इस पूरी कहानी को विस्तार से बताता है।
भोजशाला का इतिहास राजा भोज से शुरूआत
#भोजशाला की स्थापना 11वीं शताब्दी में परमार वंश के प्रसिद्ध राजा भोज (1010-1055 ईस्वी) ने की थी। इसे सरस्वती सदन या भोजशाला कहा जाता था। यहां विद्या, कला और संस्कृति का केंद्र था, जहां वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित थी। राजा भोज ने मालवा क्षेत्र को ज्ञान और साहित्य का केंद्र बनाया था।

1305 ईस्वी के आसपास अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के बाद मुस्लिम शासकों ने धार पर कब्जा किया। कई मंदिरों को नुकसान पहुंचाया गया। 14वीं-15वीं शताब्दी में स्वतंत्र मालवा सल्तनत बनी। इसी दौरान सूफी संत मौलाना कमालुद्दीन (कमाल मौला) मालवा आए। उनका देहांत 1331 में हुआ और 1459 में उनके मकबरे का निर्माण हुआ, जो भोजशाला के निकट है।
विवाद की शुरुआत और प्रमुख घटनाएं!
विवाद की जड़ें ब्रिटिश काल से जुड़ी हैं:
- 1875: खुदाई में वाग्देवी की प्रतिमा मिली, जो बाद में लंदन ले जाई गई।
- 1909: प्राचीन स्मारक कानून के तहत संरक्षित घोषित।
- 1934: धार शासकों ने इसे कमाल मौला मस्जिद घोषित कर मुसलमानों को शुक्रवार की नमाज की इजाजत दी।
- 1952: हिंदुओं ने बसंत पंचमी पर भोज उत्सव शुरू किया, ASI ने संरक्षण किया।
- 2003: ASI ने हिंदुओं को मंगलवार को पूजा और मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज की अनुमति दी।
- 2006, 2013, 2016: बसंत पंचमी और शुक्रवार एक साथ पड़ने पर तनाव, कर्फ्यू और झड़पें हुईं।
ASI सर्वे और 2024-2026 की रिपोर्ट
- मार्च 2024 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (इंदौर बेंच) ने ASI को वैज्ञानिक सर्वे का आदेश दिया।
- 22 मार्च से शुरू हुआ 98 दिनों का सर्वे जुलाई 2024 में पूरा हुआ। ASI ने 2189 पन्नों
- (कुछ स्रोतों में 2089-2100 पेज) की रिपोर्ट कोर्ट में पेश की।
रिपोर्ट के मुख्य खुलासे:
- कमाल मौला मस्जिद पुराने मंदिरों के अवशेषों, स्तंभों, शिलालेखों और मूर्तियों के हिस्सों से बनाई गई है।
- मौजूदा संरचना सदियों बाद बनी, जिसमें समरूपता या डिजाइन पर कम ध्यान दिया गया।
- परिसर में शिव, विष्णु, गणेश, वासुकी नाग आदि की मूर्तियां, ‘ॐ नमः शिवाय’ जैसे शिलालेख और पौराणिक वास्तुकला के प्रमाण मिले।
- यह 11वीं-12वीं शताब्दी के परमार काल का प्राचीन ढांचा दर्शाता है।
जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने रिपोर्ट सभी पक्षों को उपलब्ध कराने का आदेश दिया। 23 फरवरी 2026 को हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों से 2 हफ्तों में आपत्तियां मांगीं। अगली सुनवाई 16 मार्च को है। हिंदू पक्ष रिपोर्ट से उत्साहित है, जबकि मुस्लिम पक्ष आपत्ति दर्ज करने की तैयारी में है।
दोनों पक्षों के दावे
- हिंदू पक्ष: भोजशाला सरस्वती मंदिर है। बसंत पंचमी पर पूजा का अधिकार। ASI रिपोर्ट उनके दावे का समर्थन करती है।
- मुस्लिम पक्ष: कमाल मौला सूफी संत का मकबरा और मस्जिद है। शुक्रवार की नमाज की परंपरा सदियों पुरानी।
वर्तमान स्थिति
भोजशाला ASI द्वारा राष्ट्रीय महत्व का स्मारक है। दोनों समुदायों को सीमित अनुमति है, लेकिन तनाव बरकरार है। ASI रिपोर्ट के बाद मामला कानूनी रूप से निर्णायक चरण में है।
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