वट सावित्री व्रत कथा हिंदू धर्म की पवित्र परंपराओं में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। ज्येष्ठ मास की अमावस्या (2026 में 15 मई के आसपास) को सुहागिन महिलाएं पति की दीर्घायु, सौभाग्य और अखंड सुहाग के लिए यह व्रत रखती हैं। इस व्रत के साथ सावित्री-सत्यवान की कथा अटूट रूप से जुड़ी हुई है। इस कथा को सुनने या पढ़ने से पति-पत्नी का वैवाहिक जीवन सुखमय और दीर्घायु होता है।
वट सावित्री व्रत कथा का महत्व
#वट सावित्री व्रत में महिलाएं वट वृक्ष (बड़ का पेड़) की पूजा करती हैं। मान्यता है कि वट वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और शिव का वास होता है। व्रत रखने वाली स्त्रियां वट की जड़ में सूत बांधती हैं, पूजा सामग्री चढ़ाती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं। इस व्रत से पति की मृत्यु से रक्षा, संतान सुख और घरेलू सुख की प्राप्ति होती है।

सावित्री-सत्यवान की पूर्ण कथा
प्राचीन काल में मद्र देश (वर्तमान पंजाब क्षेत्र) में राजा अश्वपति राज्य करते थे। वे पराक्रमी, सत्यवादी और प्रजापालक थे, लेकिन उन्हें कोई संतान नहीं थी। राजा और रानी ने सावित्री देवी की कठोर आराधना की। प्रसन्न होकर सावित्री देवी ने वरदान दिया कि उन्हें एक तेजस्वी कन्या प्राप्त होगी।
समय पर राजा को एक दिव्य कन्या हुई, जिसका नाम सावित्री रखा गया। सावित्री बड़ी होकर अत्यंत रूपवती, बुद्धिमान और धार्मिक स्वभाव की हो गई। विवाह योग्य होने पर राजा ने उसे स्वयंवर के लिए भेजा। सावित्री तपोवनों और आश्रमों में घूमी।
एक दिन उसने साल्व देश के पूर्व राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को देखा। सत्यवान सभी गुणों से संपन्न था – सत्यवादी, बलवान और सुंदर। सावित्री ने उसी को अपना पति चुन लिया।
- जब सावित्री पिता के पास लौटी तो देवर्षि नारद राजसभा में विराजमान थे।
- सावित्री ने अपना निर्णय बताया। नारद जी ने कहा, “सत्यवान गुणवान है
- लेकिन उसकी आयु बहुत कम है। आज से ठीक एक वर्ष बाद उसकी मृत्यु हो जाएगी।”
- यह सुनकर राजा अश्वपति चिंतित हो गए और सावित्री को दूसरा वर चुनने की सलाह दी। लेकिन सावित्री ने दृढ़ता से कहा:
“पिता जी, कन्या एक बार ही वरण करती है, राजा एक बार आज्ञा देता है और पंडित एक बार वचन देते हैं। मैं सत्यवान को ही अपना पति मान चुकी हूं। अल्पायु हो या दीर्घायु, मैं किसी अन्य को नहीं चुनूंगी।”
राजा ने सावित्री का विवाह सत्यवान से कर दिया। सावित्री वन में सत्यवान के साथ रहने लगी और सास-ससुर की सेवा करने लगी।
जैसे-जैसे एक वर्ष पूरा होने लगा, सावित्री ने भाद्रपद शुक्ल द्वादशी से तीन दिन का कठोर व्रत रखा। वह निराहार रहकर सावित्री देवी का जप-ध्यान करती रही।
यमराज से सामना और बुद्धिमत्ता
- चौथे दिन सत्यवान लकड़ी काटने जंगल गया। सावित्री भी साथ गई।
- जंगल में सत्यवान को अचानक सिर में तेज दर्द हुआ। वह गिर पड़ा।
- सावित्री ने उसके सिर को गोद में रख लिया।
- तभी यमराज वहां पहुंचे। उन्होंने सत्यवान का प्राण निकालकर अपने साथ ले लिया। सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ी।
- यमराज ने कई बार उसे लौटने को कहा, लेकिन सावित्री ने पातिव्रत्य धर्म का महिमागान किया:
- यमराज प्रसन्न हुए और बोले, “पतिव्रते! तुम मुझसे कोई वर मांगो।”
सावित्री ने चतुराई से वर मांगे:
- मेरे ससुर को नेत्र ज्योति और राज्य वापस मिले।
- मेरे पिता को सौ पुत्र प्राप्त हों।
- मुझे भी सौ पुत्र हों।
- सत्यवान दीर्घायु हो।
- यमराज को जब तीसरा और चौथा वर मांगते समय सावित्री ने कहा कि
- पुत्रवती होने के लिए पति जीवित होना जरूरी है”, तो यमराज को सत्यवान के प्राण लौटाने पड़े।
- सत्यवान जीवित हो गया। दोनों घर लौटे। सास-ससुर को आंखें मिलीं और राज्य वापस मिला।
- सावित्री की भक्ति और बुद्धिमत्ता से सब कुछ ठीक हो गया।
वट सावित्री व्रत की पूजा विधि (संक्षेप में)
- सुबह स्नान कर वट वृक्ष की पूजा करें।
- वट की जड़ में सूत लपेटें, फूल, फल, मिठाई चढ़ाएं।
- सावित्री-सत्यवान की कथा पढ़ें या सुनें।
- ब्राह्मण को दान दें और व्रत कथा का पारण करें।
वट सावित्री व्रत के लाभ
- पति की लंबी आयु
- अखंड सौभाग्य
- संतान प्राप्ति
- घरेलू सुख-समृद्धि
- पति-पत्नी के बीच प्रेम बढ़ना
जो स्त्री श्रद्धा से यह व्रत करती है, वह सावित्री के समान अपने परिवार का उद्धार करती है। यह कथा सिखाती है कि पतिव्रता स्त्री की भक्ति और बुद्धि से असंभव भी संभव हो जाता है।
वट सावित्री व्रत केवल उपवास नहीं, बल्कि पातिव्रत्य, धैर्य और भक्ति का प्रतीक है। हर सुहागिन को इस व्रत को विधि-विधान से करना चाहिए।