पाकिस्तान ने सिंधु जल भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty) को लेकर एक बार फिर तनाव बढ़ता नजर आ रहा है। हाल ही में पाकिस्तान ने इस मुद्दे पर कनाडा से हस्तक्षेप और समर्थन की अपील की है। पाकिस्तान का कहना है कि भारत द्वारा संधि से जुड़े कदमों के कारण उसकी जल सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। वहीं भारत ने अपने पुराने रुख को दोहराते हुए कहा है कि जब तक सीमा पार आतंकवाद पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक इस विषय पर उसका दृष्टिकोण नहीं बदलेगा।

क्या है पूरा मामला?
रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने कनाडा से अपील की है कि वह भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि को प्रभावी बनाए रखने और दोनों देशों के बीच संवाद बहाल कराने में सहयोग करे। पाकिस्तान का आरोप है कि भारत द्वारा जल संसाधनों को लेकर उठाए गए कदम क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित कर सकते हैं।
- दूसरी ओर भारत का कहना है कि सिंधु जल संधि को मौजूदा परिस्थितियों
- में पहले की तरह जारी रखना संभव नहीं है, क्योंकि पाकिस्तान की ओर से सीमा
- पार आतंकवाद लगातार चिंता का विषय बना हुआ है।
पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि क्या है?
- सिंधु जल संधि वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई थी।
- इस समझौते में विश्व बैंक ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। इस संधि के तहत
- सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों के जल बंटवारे का प्रावधान किया गया।
संधि के अनुसार—
- पूर्वी नदियां (रावी, ब्यास और सतलुज) का उपयोग मुख्य रूप से भारत करता है।
- पश्चिमी नदियां (सिंधु, झेलम और चिनाब) का अधिकांश जल पाकिस्तान को मिलता है।
- भारत को पश्चिमी नदियों पर सीमित स्तर पर जलविद्युत परियोजनाएं और गैर-उपभोग संबंधी उपयोग की अनुमति है।
भारत का क्या कहना है?
भारत का कहना है कि किसी भी द्विपक्षीय समझौते का सफल संचालन तभी संभव है जब दोनों देशों के बीच विश्वास बना रहे। भारत ने दोहराया है कि आतंकवाद और सामान्य द्विपक्षीय संबंध एक साथ नहीं चल सकते। इसी कारण भारत सिंधु जल संधि की मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा की आवश्यकता पर जोर दे रहा है।
पाकिस्तान को क्यों है चिंता?
- पाकिस्तान की कृषि और पेयजल व्यवस्था का बड़ा हिस्सा सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है।
- ऐसे में यदि जल प्रवाह या संधि के संचालन में कोई बदलाव होता है
- तो इसका सीधा असर वहां की खेती, सिंचाई और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
- यही कारण है कि पाकिस्तान इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की कोशिश कर रहा है।
क्या कनाडा कर सकता है मध्यस्थता?
हालांकि पाकिस्तान ने कनाडा से सहयोग की अपील की है, लेकिन भारत लंबे समय से यह स्पष्ट करता आया है कि भारत-पाकिस्तान के बीच विवादों का समाधान द्विपक्षीय बातचीत से होना चाहिए। ऐसे में किसी तीसरे देश की औपचारिक मध्यस्थता स्वीकार किए जाने की संभावना कम मानी जाती है।
आगे क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में सिंधु जल संधि को लेकर दोनों देशों के बीच कूटनीतिक बातचीत और तेज हो सकती है। यदि विवाद बढ़ता है तो इसका असर क्षेत्रीय राजनीति और जल प्रबंधन से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी पड़ सकता है। फिलहाल दोनों देशों के रुख में कोई नरमी दिखाई नहीं दे रही है।
सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के संबंधों का एक महत्वपूर्ण आधार रही है। पाकिस्तान द्वारा कनाडा से मदद मांगना इस बात का संकेत है कि वह इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाना चाहता है। वहीं भारत का कहना है कि जब तक आतंकवाद से जुड़े मुद्दों का समाधान नहीं होगा, तब तक संधि पर उसका वर्तमान रुख कायम रहेगा। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों देश बातचीत के माध्यम से समाधान निकालते हैं या विवाद और गहराता है।