पाकिस्तान ट्रंप के गाजा : 22 जनवरी 2026 को एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय विकास सामने आया। पाकिस्तान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रस्तावित गाजा बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का फैसला किया है। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने इसकी पुष्टि की, लेकिन इस कदम पर पाकिस्तान में ही तीखी आलोचना शुरू हो गई है। विपक्षी नेता, पूर्व राजनयिक और सामाजिक कार्यकर्ता इसे फिलिस्तीनी अधिकारों के खिलाफ और नैतिक रूप से गलत बता रहे हैं। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार पर आरोप लग रहा है कि उन्होंने ट्रंप को खुश करने के लिए जल्दबाजी में फैसला लिया, बिना संसद या जनता से चर्चा किए।
गाजा बोर्ड ऑफ पीस क्या है?
डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा में युद्ध के बाद स्थायी शांति, पुनर्निर्माण, सुरक्षा और प्रशासन के लिए बोर्ड ऑफ पीस का प्रस्ताव रखा है। यह एक अंतरराष्ट्रीय बोर्ड है, जिसमें कई देश शामिल हो रहे हैं। ट्रंप का दावा है कि यह संयुक्त राष्ट्र (UN) से ज्यादा तेज और प्रभावी होगा। बोर्ड में ट्रंप को असीमित शक्तियां मिल सकती हैं, जिससे आलोचक इसे अमेरिकी एजेंडा थोपने का तरीका बता रहे हैं। ट्रंप ने 50 से ज्यादा देशों को न्योता भेजा, जिसमें पाकिस्तान भी शामिल है। अब तक अर्जेंटीना, आर्मेनिया, अजरबैजान, बहरीन, बेलारूस, मिस्र, हंगरी, कजाकिस्तान, कोसोवो, मोरक्को, UAE, वियतनाम और पाकिस्तान जैसे देशों ने स्वीकार किया है। कुछ रिपोर्ट्स में 7-8 मुस्लिम देशों का जिक्र है।

पाकिस्तान ने बोर्ड में शामिल होने का फैसला ट्रंप के न्योते पर लिया, जिसमें प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को सीधे आमंत्रित किया गया था। पाकिस्तान का कहना है कि इससे स्थायी संघर्ष विराम, मानवीय सहायता बढ़ाने और गाजा के पुनर्निर्माण में योगदान मिलेगा। वे फिलिस्तीनी भाइयों के हक के लिए आवाज उठाने की उम्मीद जता रहे हैं।
पाकिस्तानी नेताओं की तीखी प्रतिक्रिया!
- फैसला आने के बाद पाकिस्तान में बवाल मच गया। सीनेट में विपक्ष के नेता अल्लामा राजा नासिर
- अब्बास ने इसे “नैतिक रूप से गलत और अस्वीकार्य” बताया। उन्होंने कहा,
- “यह पहल शुरू से गलत थी। जंग के बाद गाजा को बाहरी लोगों द्वारा चलाने का इंतजाम
- फिलिस्तीनी लोगों से उनका खुद का राज छीन लेता है। जब पुनर्निर्माण, सुरक्षा और
- राजनीति की जिम्मेदारी बाहरी लोगों को सौंपी जाती है, तो यह नए जमाने की गुलामी जैसा लगता है।”
मुस्तफा नवाज खोखर (Tehreek-e-Tahaffuz-e-Ain-e-Pakistan) ने इसे “औपनिवेशिक कोशिश” करार दिया। उन्होंने लिखा, “यह बोर्ड UN के मुकाबले दूसरा सिस्टम खड़ा करने की कोशिश है। ट्रंप को असीमित ताकत मिलेगी, बिना रोक-टोक अपना एजेंडा लागू करने की। संसद और जनता से बिना चर्चा के फैसला लिया गया, जो सरकार की बेपरवाही दिखाता है।”
- रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने फैसले का बचाव किया। उन्होंने कहा, “बड़े देशों को न्योता गया था।
- अगर पाकिस्तान बाहर रहता, तो फैसलों में हमारी कोई अहमियत नहीं रहती।
- मौजूद रहकर हम फिलिस्तीनी भाइयों के लिए बेहतर आवाज उठा सकेंगे।”
- पूर्व अमेरिकी राजदूत मलीहा लोधी और पत्रकार जाहिद हुसैन ने भी सरकार पर सवाल उठाए।
- कई लोग इसे ट्रंप की “जी-हुजूरी” और फिलिस्तीन से “गद्दारी” बता रहे हैं।
राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव
- पाकिस्तान का यह कदम ट्रंप प्रशासन के साथ निकटता दिखाता है, खासकर दावोस सम्मेलन
- के दौरान आर्मी चीफ आसिम मुनीर की मौजूदगी के संदर्भ में। लेकिन घरेलू स्तर पर
- शहबाज सरकार के लिए यह राजनीतिक नुकसानदायक साबित हो सकता है।
- आलोचक कह रहे हैं कि पाकिस्तान ने फिलिस्तीनी संघर्ष में अपना नैतिक स्टैंड कमजोर किया है।
- कुछ रिपोर्ट्स में बोर्ड में शामिल होने के लिए 1 बिलियन डॉलर (8400 करोड़ रुपये) की
- “एंट्री फीस” का भी जिक्र है, जो कर्ज में डूबे पाकिस्तान के लिए बड़ा बोझ हो सकता है।
यह घटना दिखाती है कि गाजा संकट में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नए गठजोड़ बन रहे हैं, लेकिन पाकिस्तान जैसे देशों में घरेलू विरोध इसे चुनौतीपूर्ण बना रहा है। फिलिस्तीनी मुद्दे पर पाकिस्तान की पारंपरिक स्थिति अब सवालों के घेरे में है।