दिल्ली का जंतर मंतर का निर्माण महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने वर्ष 1724 में करवाया था। सवाई जय सिंह द्वितीय जयपुर के शासक थे और उन्हें खगोल विज्ञान, गणित तथा वास्तुकला में विशेष रुचि थी।
उस समय उपलब्ध खगोलीय तालिकाओं में कई त्रुटियां थीं। इन्हें दूर करने और सूर्य, चंद्रमा तथा ग्रहों की सटीक स्थिति का अध्ययन करने के लिए उन्होंने भारत में कुल पांच जंतर मंतर वेधशालाओं का निर्माण कराया। ये दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में स्थापित किए गए थे।

जंतर मंतर नाम का क्या अर्थ है?
“जंतर” शब्द संस्कृत के ‘यंत्र’ से बना है, जिसका अर्थ है उपकरण या इंस्ट्रूमेंट।
वहीं “मंतर” शब्द ‘मंत्रणा’ या गणना से जुड़ा माना जाता है।
इस प्रकार जंतर मंतर का अर्थ हुआ गणना करने वाले वैज्ञानिक उपकरणों का समूह।
जंतर मंतर बनाने का उद्देश्य
जंतर मंतर का मुख्य उद्देश्य खगोलीय घटनाओं का सटीक अध्ययन करना था। यहां स्थापित विशाल पत्थर के उपकरणों की सहायता से वैज्ञानिक और ज्योतिषी निम्न कार्य करते थे—
- सूर्य और चंद्रमा की स्थिति का अध्ययन
- ग्रहों की गति का निर्धारण
- समय की सटीक गणना
- ग्रहण की भविष्यवाणी
- पंचांग तैयार करना
- खगोलीय तालिकाओं को अधिक सटीक बनाना
उस समय आधुनिक दूरबीनें उपलब्ध नहीं थीं, इसलिए इन विशाल यंत्रों का निर्माण किया गया।
दिल्ली जंतर मंतर के 4 प्रमुख यंत्र
सम्राट यंत्र (Samrat Yantra)
सम्राट यंत्र जंतर मंतर का सबसे प्रसिद्ध उपकरण है।
यह एक विशाल सूर्य घड़ी (Sundial) है जिसकी सहायता से समय का अत्यंत सटीक निर्धारण किया जाता था।
इस यंत्र की सहायता से सूर्य की दिशा देखकर समय ज्ञात किया जाता था और अनुभवी प्रेक्षक कुछ ही सेकंड के अंतर से सही समय बता सकते थे।
जयप्रकाश यंत्र (Jai Prakash Yantra)
जयप्रकाश यंत्र आकाशीय पिंडों की स्थिति जानने के लिए बनाया गया था।
इसकी विशेष संरचना के कारण सूर्य, चंद्रमा और ग्रहों की स्थिति का आसानी से अध्ययन किया जा सकता था।
यह उस समय के सबसे उन्नत वैज्ञानिक उपकरणों में से एक माना जाता है।
राम यंत्र (Ram Yantra)
राम यंत्र का उपयोग किसी ग्रह या तारे की ऊंचाई (Altitude) और दिशा (Azimuth) मापने के लिए किया जाता था।
इस यंत्र की गोलाकार संरचना वैज्ञानिक दृष्टि से बेहद अनोखी मानी जाती है और आज भी यह लोगों को आकर्षित करती है।
मिश्र यंत्र (Misra Yantra)
मिश्र यंत्र वास्तव में पांच अलग-अलग उपकरणों का संयोजन है।
इसका उपयोग विभिन्न स्थानों के समय की तुलना करने, दोपहर का सटीक समय ज्ञात करने तथा खगोलीय गणनाओं के लिए किया जाता था।
यह जंतर मंतर का सबसे जटिल उपकरण माना जाता है।
दिल्ली के अलावा कहां-कहां हैं जंतर मंतर?
महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने भारत में कुल पांच जंतर मंतर बनवाए थे—
- दिल्ली
- जयपुर
- उज्जैन
- वाराणसी
- मथुरा (अब अधिकांश भाग नष्ट हो चुका है)
इनमें जयपुर का जंतर मंतर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में भी प्रसिद्ध है।
आज क्यों खास है दिल्ली का जंतर मंतर?
आज दिल्ली का जंतर मंतर भारतीय वैज्ञानिक विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक है। यहां हर वर्ष देश-विदेश से हजारों पर्यटक, विद्यार्थी और शोधकर्ता आते हैं।
यह स्थान यह दर्शाता है कि भारत में सैकड़ों वर्ष पहले भी खगोल विज्ञान और गणित का ज्ञान अत्यंत विकसित था।
दिल्ली का जंतर मंतर से जुड़े रोचक तथ्य
- इसका निर्माण वर्ष 1724 में हुआ था।
- इसे महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने बनवाया था।
- यहां कुल 13 खगोलीय उपकरण मौजूद हैं, जिनमें चार प्रमुख यंत्र सबसे प्रसिद्ध हैं।
- यह बिना दूरबीन के खगोलीय अध्ययन करने वाली ऐतिहासिक वेधशाला है।
- यहां के उपकरण पत्थर और चिनाई से बनाए गए हैं।
- जंतर मंतर भारतीय विज्ञान, गणित और वास्तुकला का अद्भुत संगम माना जाता है।
दिल्ली का जंतर मंतर केवल एक ऐतिहासिक स्मारक नहीं, बल्कि भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियों का जीवंत प्रमाण है। महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय द्वारा निर्मित यह वेधशाला उस समय की उन्नत खगोलीय समझ को दर्शाती है। यहां स्थित सम्राट यंत्र, जयप्रकाश यंत्र, राम यंत्र और मिश्र यंत्र आज भी लोगों को भारतीय विज्ञान की समृद्ध परंपरा से परिचित कराते हैं। यदि आप दिल्ली घूमने जाएं, तो इस ऐतिहासिक धरोहर को अवश्य देखें और भारत की वैज्ञानिक विरासत को करीब से महसूस करें।
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