परिसीमन विधेयक पर NDA भारतीय राजनीति में परिसीमन (Delimitation) को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। हाल के दिनों में यह सवाल उठाया जा रहा है कि यदि केंद्र सरकार परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) लाती है, तो क्या राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के पास इसे पारित कराने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत होगा? इस मुद्दे ने राजनीतिक दलों, विशेषज्ञों और आम जनता के बीच नई बहस छेड़ दी है।
परिसीमन देश की चुनावी व्यवस्था से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विषय है, क्योंकि इसके माध्यम से लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं तथा सीटों की संख्या का पुनर्निर्धारण किया जाता है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि संसद में इस प्रकार के विधेयक को पारित कराने के लिए सरकार की स्थिति कितनी मजबूत है।

क्या होता है परिसीमन?
- परिसीमन का अर्थ है जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को पुनः निर्धारित करना।
- इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि प्रत्येक क्षेत्र को उसकी जनसंख्या के अनुसार उचित प्रतिनिधित्व मिल सके।
- भारत में अंतिम परिसीमन 2008 में लागू किया गया था। वर्तमान व्यवस्था के
- अनुसार 2026 के बाद नई जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
परिसीमन विधेयक पर NDA दो-तिहाई बहुमत क्यों जरूरी है?
यदि कोई संवैधानिक संशोधन विधेयक संसद में लाया जाता है, तो उसे पारित कराने के लिए दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। सामान्यतः इसके लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन के साथ-साथ कुल सदस्य संख्या के बहुमत की जरूरत होती है।
इसी कारण परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर संसद में संख्या बल का विशेष महत्व होता है।
लोकसभा में NDA की स्थिति!
- लोकसभा में NDA के पास मजबूत बहुमत है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) और उसके
- सहयोगी दल मिलकर सरकार चला रहे हैं। हालांकि दो-तिहाई बहुमत के लिए केवल साधारण बहुमत पर्याप्त नहीं होता।
- यदि सभी सदस्य मतदान में भाग लेते हैं, तो सरकार को विपक्ष के कुछ सदस्यों या अन्य
- दलों का समर्थन भी प्राप्त करना पड़ सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है
- कि कई क्षेत्रीय दल परिसीमन के मुद्दे पर अपना अलग रुख अपना सकते हैं।
राज्यसभा का गणित
- #राज्यसभा में स्थिति लोकसभा की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण मानी जाती है।
- यहां NDA के पास पूर्ण बहुमत नहीं है और उसे विभिन्न क्षेत्रीय दलों के समर्थन की आवश्यकता पड़ सकती है।
- राज्यसभा में किसी भी संवैधानिक संशोधन को पारित कराने के लिए सरकार को अतिरिक्त
- समर्थन जुटाना होगा। यही कारण है कि परिसीमन विधेयक पर राज्यसभा का गणित सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
परिसीमन पर दक्षिण भारत की चिंता
परिसीमन को लेकर दक्षिण भारत के कई राज्यों ने चिंता व्यक्त की है। उनका मानना है कि यदि सीटों का निर्धारण केवल जनसंख्या के आधार पर किया गया तो दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो सकता है, क्योंकि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है।
वहीं कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि लोकतंत्र में जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व होना चाहिए। यही कारण है कि परिसीमन का मुद्दा केवल राजनीतिक नहीं बल्कि संवैधानिक और संघीय ढांचे से भी जुड़ा हुआ है।
विपक्ष की रणनीति क्या होगी?
- विपक्षी दल इस मुद्दे को लेकर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर सकते हैं।
- कई दलों का मानना है कि परिसीमन प्रक्रिया में सभी राज्यों के हितों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
- यदि सरकार विधेयक लाती है तो संसद में इस पर लंबी बहस होने की संभावना है।
- ऐसे में विपक्ष का रुख विधेयक के भविष्य को काफी हद तक प्रभावित कर सकता है।
राजनीतिक महत्व
परिसीमन केवल सीटों के पुनर्वितरण का मामला नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर भविष्य की राजनीति और चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है। कई राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ या घट सकती है, जिससे राष्ट्रीय राजनीति का संतुलन भी प्रभावित हो सकता है।
इसी वजह से सभी राजनीतिक दल इस विषय पर सावधानीपूर्वक अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं।
परिसीमन विधेयक को लेकर NDA के दो-तिहाई बहुमत का सवाल भारतीय राजनीति का महत्वपूर्ण विषय बन गया है। लोकसभा में NDA अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में दिखाई देता है, जबकि राज्यसभा में उसे अतिरिक्त समर्थन की आवश्यकता पड़ सकती है। आने वाले समय में परिसीमन पर होने वाली चर्चा देश की राजनीतिक दिशा और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित कर सकती है। इसलिए यह मुद्दा केवल संख्या बल का नहीं, बल्कि भारत के संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक व्यवस्था से भी जुड़ा हुआ है।
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