पाकिस्तान की मध्यस्थता : अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनाव के बीच पाकिस्तान मध्यस्थता की भूमिका निभाने जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार को घोषणा की कि अमेरिकी वार्ताकार सोमवार को इस्लामाबाद पहुंचेंगे और ईरान के साथ दूसरे दौर की बातचीत करेंगे। लेकिन अमेरिकी थिंक टैंक अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो माइकल रुबिन ने इस मध्यस्थता को अमेरिका के लिए शर्मिंदगी और खतरा बताया है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की भूमिका में दुर्भावना भरी है और भारत इस भूमिका के लिए ज्यादा उपयुक्त होता।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब वेस्ट एशिया में संघर्ष जारी है, युद्धविराम 22 अप्रैल को खत्म होने वाला है और ईरान दूसरे दौर की बातचीत से इनकार कर चुका है। ट्रंप ने चेतावनी दी कि अगर ईरान अमेरिकी प्रस्तावित समझौते को ठुकराएगा तो वे ईरान की सिविलियन इंफ्रास्ट्रक्चर को तबाह कर देंगे।

माइकल रुबिन का तीखा आलोचना
माइकल रुबिन ने संडे गार्डियन में प्रकाशित अपने लेख में पाकिस्तान की मध्यस्थता को लेकर अमेरिका की नीति पर सवाल उठाए। उन्होंने लिखा कि पाकिस्तान की भूमिका हमेशा से दुर्भावनापूर्ण रही है। पाकिस्तानी परमाणु वैज्ञानिक ए.के. खान ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम में मदद की थी, और अब अमेरिका पाकिस्तान को उस गड़बड़ी का इनाम दे रहा है।
- रुबिन ने आगे कहा, “पाकिस्तान दुनिया के सबसे ज्यादा यहूदियों-विरोधी और
- अमेरिका-विरोधी देशों में से एक है।” उन्होंने ओसामा बिन लादेन अभियान का जिक्र करते हुए
- बताया कि पाकिस्तानी सरकार ने अमेरिकी रेड को “गहरी निराशा” बताया था।
- उन्होंने ट्रंप की नीति की आलोचना करते हुए कहा, “ट्रंप का मानना कि उनका एक अमेरिकी वकील
- से दोस्ती पाकिस्तान के दशकों के बुरे कामों को मिटा देगी, यह विचित्र है।
- राष्ट्रीय सुरक्षा के बड़े मुद्दों को पाकिस्तान के जरिए सुलझाने की कोशिश करना
- बच्चों के स्कूल में बाल यौन शोषक को शिक्षक नियुक्त करने जैसा है।”
रुबिन ने चेतावनी दी कि पाकिस्तान पर भरोसा करके ट्रंप अफगानिस्तान, गाजा, सीरिया और यमन की गलतियों को दोहरा रहे हैं। उन्होंने कहा, “ऐसे समझौते जीत को हार में बदल देते हैं। नतीजा न सिर्फ अमेरिका की शर्मिंदगी होगा, बल्कि इस्लामाबाद और ज्यादा घमंडी और ताकतवर हो जाएगा, जिसे लगेगा कि ट्रंप ने उसे आतंकवाद जारी रखने की पूरी छूट दे दी है।”
पाकिस्तान की मध्यस्थता भारत को बेहतर मध्यस्थ बताया!
- माइकल रुबिन ने भारत का जिक्र करते हुए साफ कहा कि भारत इस मध्यस्थता की भूमिका
- के लिए पाकिस्तान से कहीं ज्यादा उपयुक्त और सही विकल्प होता।
- उन्होंने लिखा, “भारत को सैन्य रूप से तैयार रहना चाहिए, लेकिन उसे यह भी पूछना चाहिए
- कि पाकिस्तानी सरकार ने विदेश मंत्रालय को कैसे आउटमैन्यूवर कर लिया और खुद को मध्यस्थ
- के रूप में पेश कर लिया। पाकिस्तान ने खुद को मध्यस्थ बना लिया, जबकि भारत इस भूमिका के लिए बहुत ज्यादा उचित होता।”
- यह बयान भारत की विदेश नीति और क्षेत्रीय भूमिका पर नई बहस छेड़ रहा है।
- विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की मध्यस्थता अमेरिका के हितों को नुकसान पहुंचा सकती है
- जबकि भारत की निष्पक्ष और मजबूत स्थिति इसे बेहतर विकल्प बनाती है।
पृष्ठभूमि: अमेरिका-ईरान तनाव और पाकिस्तान की भूमिका
ट्रंप ने रविवार को कहा कि अमेरिकी टीम सोमवार को पाकिस्तान पहुंचेगी। ईरान पहले दौर की बातचीत के बाद दूसरे दौर से कतरा रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य में हालिया घटनाओं (ईरानी जहाज जब्ती) के बाद तनाव और बढ़ा है।
पाकिस्तान खुद को मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा है, लेकिन रुबिन जैसे विशेषज्ञ इसे अमेरिका की रणनीतिक गलती बता रहे हैं। पाकिस्तान का इतिहास आतंकवाद समर्थन, परमाणु प्रसार और अमेरिका विरोधी रुख से भरा पड़ा है।
संभावित प्रभाव!
- अमेरिका के लिए: पाकिस्तान पर निर्भरता से अमेरिकी सुरक्षा हित प्रभावित हो सकते हैं
- और यह एक बड़ी शर्मिंदगी साबित हो सकती है।
- भारत के लिए: भारत को अपनी सैन्य तैयारियों पर जोर देना चाहिए
- और पाकिस्तान की कूटनीतिक चालों पर नजर रखनी चाहिए।
- क्षेत्रीय स्थिरता: अगर बातचीत असफल रही तो मध्य पूर्व में तनाव बढ़ सकता है
- जिसका असर तेल की कीमतों और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन को मध्यस्थ चुनते समय सावधानी बरतनी चाहिए। पाकिस्तान की भूमिका भविष्य में अमेरिका को महंगा पड़ सकती है।
पाकिस्तान की मध्यस्थता को अमेरिकी विशेषज्ञ माइकल रुबिन ने खुलकर शर्मिंदगी और खतरा बताया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि भारत इस भूमिका के लिए ज्यादा सही होता। ईरान-अमेरिका बातचीत के दूसरे दौर से पहले यह बहस गर्म हो गई है। अब देखना होगा कि ट्रंप प्रशासन पाकिस्तान पर कितना भरोसा करता है और भारत अपनी कूटनीतिक और सैन्य रणनीति कैसे तैयार करता है।
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