महिला आरक्षण बिल लोकसभा : 18 अप्रैल 2026 को संसद के विशेष सत्र में एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला। लोकसभा में महिला आरक्षण बिल (संविधान का 131वां संशोधन विधेयक 2026) गिर गया। विधेयक के पक्ष में 298 वोट पड़े जबकि विरोध में 230 वोट। संविधान संशोधन के लिए दो तिहाई बहुमत यानी कम से कम 352 वोटों की जरूरत थी, जो नहीं मिल पाए। कुल 528 सदस्यों ने मतदान में हिस्सा लिया।
यह विधेयक महिलाओं को लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देने से जुड़ा था। 2023 में मूल नारी शक्ति वंदन अधिनियम पास हो चुका था, लेकिन उसकी क्रियान्विति परिसीमन (delimitation) के बाद तय की गई थी। अब 2026 में सरकार ने संशोधन के जरिए इसे जल्द लागू करने की कोशिश की, लेकिन विपक्ष के विरोध के कारण यह सदन में फेल हो गया।

विधेयक क्यों गिरा? वोटिंग का पूरा गणित
लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक पास करने के लिए दो तिहाई बहुमत अनिवार्य है। सरकार की ओर से जोरदार प्रयास किए गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वोटिंग से पहले सोशल मीडिया पर विपक्षी सांसदों से अपील की कि वे महिलाओं के हित में विधेयक के पक्ष में वोट करें। गृह मंत्री अमित शाह ने भी सदन में चर्चा की।
- फिर भी विपक्ष एकजुट रहा। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दल ने कहा
- कि 2023 वाला विधेयक ज्यों का त्यों लागू किया जाए। नए संशोधन की जरूरत नहीं है।
- अशोक गहलोत जैसे नेताओं ने आरोप लगाया कि भाजपा जानबूझकर बिना
- सर्वदलीय बैठक के विशेष सत्र बुलाकर यह स्थिति पैदा कर रही थी।
विपक्ष का तर्क था कि सरकार अलग-अलग दलों से बात करके फूट डालने की कोशिश कर रही थी। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने लगातार सर्वदलीय बैठक की मांग की थी, लेकिन वह नहीं हुई।
भाजपा को पहले से था विधेयक गिरने का अंदाजा?
- सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा को शुरू से ही पता था कि यह विधेयक दो तिहाई
- बहुमत नहीं पा सकेगा? कई जानकारों का मानना है कि सरकार को विपक्ष की
- एकजुटता का अंदाजा था। फिर भी विशेष सत्र बुलाया गया।
- अशोक गहलोत ने स्पष्ट कहा, “प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह को पहले दिन से मालूम था
- कि संविधान संशोधन बिना विपक्ष के सहयोग के पास नहीं हो सकता।
- इसके बावजूद उन्होंने विपक्ष को विश्वास में नहीं लिया।”
गहलोत ने इसे भाजपा की सोची-समझी साजिश बताया। उनका कहना था कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बीच यह सत्र बुलाया गया ताकि विधेयक गिरने का ठीकरा विपक्ष पर फोड़ा जा सके।
भाजपा की ओर से विपक्ष पर पलटवार किया गया। भाजपा नेताओं ने कहा कि कांग्रेस समेत विपक्ष महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ है। विधेयक गिरते ही भाजपा ने विपक्ष पर हमला बोल दिया।
महिला आरक्षण बिल लोकसभा राजनीतिक फायदे की रणनीति?
- जानकारों का कहना है कि महिला आरक्षण बिल गिरने का फायदा भी भाजपा उठा सकती है।
- विधानसभा चुनावों में महिला वोट बैंक महत्वपूर्ण होता है। अगर बिल पास हो
- जाता तो भाजपा इसे अपनी उपलब्धि बताती। अब गिरने पर विपक्ष को
- महिलाओं के खिलाफ” बताकर राजनीति की जा सकती है।
- यह मुद्दा पहले ही पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में गरमा गया है। PM मोदी ने बंगाल
- में इस मुद्दे पर पिच तैयार कर दी है। 2029 के लोकसभा चुनाव में भी यह मुद्दा भाजपा के लिए हथियार बन सकता है।
- विपक्ष का आरोप है कि 2023 का बिल तो पास हो गया था, लेकिन उसकी क्रियान्विति
- को परिसीमन तक टाल दिया गया था। अब जब संशोधन से इसे 2029 चुनाव
- से पहले लागू करने की कोशिश हुई तो विपक्ष ने विरोध किया।
आगे क्या होगा महिला आरक्षण की राह?
विधेयक लोकसभा में गिरने के बाद अब इसे दोबारा पेश करने या संशोधित रूप में लाने के विकल्प हैं। लेकिन संविधान संशोधन के लिए दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत जरूरी है। राज्यसभा में भी स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
सरकार ने 17 अप्रैल को महिला आरक्षण कानून की अधिसूचना जारी कर दी थी, लेकिन विधेयक गिरने से क्रियान्विति पर असर पड़ेगा।
महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाना हर दल का साझा लक्ष्य होना चाहिए। 2023 का नारी शक्ति वंदन अधिनियम महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम था। अब जरूरत है कि सभी दल मिलकर इस मुद्दे पर सहमति बनाएं। बिना राजनीतिक द्वंद्व के महिलाओं को उनके हक दिलाए जाएं।
राजनीति से ऊपर उठकर सोचें!
महिला आरक्षण बिल का गिरना भारतीय लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। भाजपा और विपक्ष दोनों पक्षों के तर्कों में दम है, लेकिन अंत में महिलाओं का भविष्य दांव पर है।