प्रेमानंद महाराज : वृंदावन। श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के एकांतिक वार्तालाप (Ekantik Vartalaap) में भक्तों के प्रश्नों का सरल, गहरा और व्यावहारिक समाधान मिलता है। 9 अप्रैल 2026 को महाराज जी ने एक महत्वपूर्ण विषय पर प्रकाश डाला “विपत्ति आने पर मन हो जाए विचलित तो क्या करें?”। जीवन में संकट, दुख या मुसीबत जब आती है तो मन अक्सर अस्थिर, भयभीत या निराश हो जाता है। ऐसे समय में क्या करना चाहिए? प्रेमानंद महाराज ने इस पर बहुत स्पष्ट और प्रभावी मार्गदर्शन दिया।
#प्रेमानंद महाराज विपत्ति में मन को नियंत्रित करने का मूल मंत्र
महाराज जी ने बताया कि विपत्ति आने पर मन का विचलित होना स्वाभाविक है, लेकिन इसे स्थिर रखने और संकट से पार पाने का सबसे सटीक उपाय है – सद्गुरु या साधु-संत की शरण में जाना। जब तक हम साधु-संतों के साथ संगति नहीं करते और उनकी साधना पद्धति का पालन नहीं करते, तब तक मन अशुद्ध रहता है। अशुद्ध मन हमें भगवान से दूर ले जाता है।

महाराज जी ने कहा – “जो अपने गुरु के अधीन नहीं है, मन उसके अधीन कभी हो ही नहीं सकता। मन अधीन होगा तभी हम हर विपत्ति का सामना कर पाएंगे।”
सभी आध्यात्मिक साधनाओं का उद्देश्य मन को शुद्ध करना है। और मन की शुद्धि तभी संभव है जब हम किसी सद्गुरु के मार्गदर्शन में रहें – चाहे हम गृहस्थ हों या विरक्त। गुरु के अधीन रहने से मन वश में होता है और भगवान की ओर मुड़ता है।
शरणागति और पापों का नाश
- प्रेमानंद महाराज ने एक भक्ति श्लोक का उदाहरण दिया: “सन्मुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।”
- अर्थात् जब जीव भगवान की ओर मुख करता है, तो करोड़ों जन्मों के पाप तुरंत नष्ट हो जाते हैं।
- गुरु की शरण लेने वाला व्यक्ति, चाहे वह आधुनिक कपड़ों में हो या साधु वेश में, महात्मा बन जाता है।
- सच्ची शरणागति (समर्पण) भगवान की तभी संभव है जब पहले हम भगवत्प्रेमी महात्माओं की शरण लें।
- गुरु की कृपा से मन-वचन-कर्म एक हो जाते हैं। आमतौर पर इंसान की वाणी एक कहती है
- मन कुछ और सोचता है और कर्म कुछ और करते हैं। इस असंगति को दूर करने का एकमात्र उपाय सद्गुरु की शरण है।
- महाराज जी ने जोर देकर कहा: “हमारी सामर्थ्य तो शरणागति होने की भी नहीं है।
- जब मन-वचन और कर्म से एक होना है तो किसी सद्गुरू की शरण लो और उसके अनुसार ही चलो।”
विपत्ति में क्या करें? व्यावहारिक सलाह
- तुरंत गुरु की शरण लें: विपत्ति के समय सबसे पहले अपने सद्गुरु या साधु-संत से मार्गदर्शन लें।
- उनकी बताई साधना पद्धति का सख्ती से पालन करें।
- मन को भगवान की ओर मोड़ें: गुरु के अधीन रहकर मन को वश में करें। इससे विपत्तियां छोटी लगने लगती हैं।
- दुनिया के काम करते हुए भी भक्ति बनाए रखें: गृहस्थ जीवन में भी कर्तव्य निभाएं, लेकिन सब कुछ भगवान को प्रसन्न करने के लिए करें।
- संगति का महत्व: सत्संग और साधु-संतों के साथ रहने से मन स्वतः शुद्ध होता है
- और संकटों का सामना करने की शक्ति आती है।
- समर्पण का भाव: पूरा जीवन गुरु और भगवान के चरणों में समर्पित कर दें। गुरु ही मोक्ष का द्वार हैं।
- महाराज जी ने स्पष्ट किया कि बिना गुरु के मार्गदर्शन के मन को नियंत्रित करना असंभव है।
- गुरु की कृपा से ही जीव करोड़ों जन्मों के पापों से मुक्त होकर भगवान की प्राप्ति कर सकता है।
आज के समय में प्रासंगिकता
- आजकल तनाव, आर्थिक संकट, पारिवारिक समस्याएं, स्वास्थ्य संबंधी विपत्तियां आम हैं।
- ऐसे में प्रेमानंद महाराज का यह उपदेश बहुत उपयोगी है। उन्होंने बताया कि विपत्ति को भगवान की परीक्षा
- समझकर गुरु के बताए मार्ग पर चलें। इससे न केवल मन शांत रहेगा, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति भी होगी।
प्रेमानंद महाराज कौन हैं?
श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज वृंदावन धाम के प्रसिद्ध रसिक संत हैं। उनका आश्रम श्री हित राधा केली कुंज, वराह घाट, वृंदावन में है। उनके एकांतिक वार्तालाप और दर्शन प्रतिदिन भक्तों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन देते हैं। सरल भाषा, गहरी भक्ति और व्यावहारिक सलाह उनकी शिक्षाओं की खासियत है।
- 9 अप्रैल 2026 के एकांतिक वार्तालाप में प्रेमानंद महाराज ने विपत्ति के समय मन को
- विचलित होने से बचाने का सरल लेकिन शक्तिशाली उपाय बताया – सद्गुरु की
- शरण और उनकी आज्ञा का पालन। जब मन गुरु के अधीन हो जाता है
- तो विपत्तियां खुद-ब-खुद छोटी पड़ जाती हैं और भगवान की कृपा प्राप्त होती है।
जो भी भक्त जीवन में संकट का सामना कर रहा है, वह महाराज जी के इस प्रवचन को सुनकर या पढ़कर अवश्य लाभ उठाए। गुरु कृपा से हर विपत्ति पार हो जाती है और जीवन भक्ति-मय बन जाता है।