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पश्चिम बंगाल मतदाता सूची विवाद ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में खुद रखी दलीलें, CJI ने कहा – कोई निर्दोष वोटर बाहर नहीं रहेगा!

On: February 4, 2026 9:47 AM
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पश्चिम बंगाल मतदाता सूची : पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR – Special Intensive Revision) को लेकर चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट के चरम पर पहुंच गया है। 4 फरवरी 2026 को हुई सुनवाई में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद अदालत में मौजूद रहीं और अपनी दलीलें रखने की कोशिश की। हालांकि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने उन्हें टोकते हुए कहा कि उनकी ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, गोपाल शंकरनारायणन और श्याम दीवान पहले ही सभी बिंदु उठा चुके हैं। फिर भी ममता ने भावुक होकर कहा, “मैं न्याय के लिए आई हूं… लोकतंत्र बचाइए!” अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 9 फरवरी 2026 को तय की है और चुनाव आयोग को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

SIR विवाद की पूरी कहानी क्या है?

पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग ने 2025 के अंत से SIR प्रक्रिया शुरू की, जिसमें मतदाता सूची में ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ (तार्किक विसंगति) के आधार पर नाम हटाए जा रहे हैं। इसमें स्पेलिंग में मामूली अंतर, पता बदलना, सरनेम चेंज (शादी के बाद) जैसी वजहें शामिल हैं। ममता बनर्जी और TMC का आरोप है कि इससे बड़े पैमाने पर योग्य मतदाताओं (लगभग 1.25 करोड़ से ज्यादा) को वोटिंग अधिकार से वंचित किया जा रहा है।

पश्चिम बंगाल मतदाता सूची
पश्चिम बंगाल मतदाता सूची

ममता ने अदालत में कहा:

  • “बंगाल को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है। अन्य राज्यों में ऐसी सख्ती क्यों नहीं?”
  • “यह डिस्क्रिपेंसी नहीं, डिस्क्रिपेंसी मैपिंग है। रवींद्रनाथ टैगोर की स्पेलिंग बदलने पर भी नाम कट रहे हैं।”
  • “चुनाव आयोग ‘व्हाट्सऐप कमीशन’ बन गया है। मैंने छह पत्र लिखे, कोई जवाब नहीं आया।”
  • “फसल कटाई और पूजा के मौसम में नोटिस जारी किए गए, जब लोग बाहर थे। 24 साल बाद अचानक चार महीने में यह सब क्यों?”
  • “मैं पार्टी के लिए नहीं, साधारण नागरिक के रूप में लड़ रही हूं।”

ममता ने आरोप लगाया कि माइक्रो-ऑब्जर्वर ज्यादातर BJP शासित राज्यों से लाए गए हैं, जो नाम काट रहे हैं। उन्होंने कहा कि 58 लाख नाम पहले ही ‘मृत’ घोषित कर हटाए जा चुके हैं, और कई महिलाओं के नाम कटने से यह ‘एंटी-वूमन’ प्रक्रिया लगती है।

सुप्रीम कोर्ट और CJI के क्या बयान?

CJI ने संतुलित रुख अपनाया:

  • “कोई निर्दोष नागरिक वोटर लिस्ट से बाहर नहीं रहना चाहिए।”
  • नाम हटाने के तीन आधार: दोषसिद्ध व्यक्ति, राज्य/देश से बाहर गए, या गैर-नागरिक।
  • “बंगाल में नामों का उच्चारण अलग होता है। AI-आधारित रिकॉर्डिंग में भाषाई गलती से नाम न कटे।”
  • “असम में BLO पर दबाव और मौतों की बातें क्यों नहीं आ रहीं, जबकि बंगाल में 150 से ज्यादा मौतें बताई जा रही हैं?”
  • “जरूरत पड़ी तो निर्देश देंगे कि हर नोटिस BLO की अनुमति से जारी हो।”
  • अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि नाम डिस्क्रिपेंसी पर नोटिस सावधानी से भेजे जाएं।
  • पश्चिम बंगाल सरकार को ग्रुप-बी अधिकारियों (क्लास-2) की सूची पेश करने को कहा गया।
  • CJI ने कहा कि प्रक्रिया में समय की कमी है, लेकिन पारदर्शिता जरूरी है।

राजनीतिक निहितार्थ और 2026 विधानसभा चुनाव

  • पश्चिम बंगाल में 2026 में विधानसभा चुनाव होने हैं। फाइनल वोटर लिस्ट 14 फरवरी 2026 तक जारी होनी है।
  • ममता की याचिका (28 जनवरी 2026 को दायर) में मांग है कि SIR रद्द कर पुरानी 2025 लिस्ट
  • पर ही चुनाव हों। TMC का दावा है कि SIR से लाखों TMC समर्थक वोटर
  • (खासकर अल्पसंख्यक और महिलाएं) प्रभावित होंगे।

BJP का पक्ष: चुनाव आयोग स्वतंत्र है और प्रक्रिया सभी राज्यों में समान है। लेकिन ममता ने इसे ‘BJP के इशारे पर’ बताया। सॉलिसिटर जनरल ने अदालत में कहा कि राज्य सरकार ने पर्याप्त अधिकारी नहीं दिए, इसलिए माइक्रो-ऑब्जर्वर लगाए गए।

क्या होगा आगे

9 फरवरी को सुनवाई में चुनाव आयोग का जवाब आएगा। अगर अदालत SIR पर रोक लगाती है या समय बढ़ाती है, तो चुनावी समीकरण बदल सकते हैं। ममता बनर्जी की यह लड़ाई लोकतंत्र, मतदाता अधिकार और चुनावी निष्पक्षता का बड़ा मुद्दा बन गई है। क्या सुप्रीम कोर्ट बंगाल के करोड़ों वोटरों को राहत देगा? इंतजार रहेगा।

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